Thursday, 29 July 2021

Nazm(कविता)_Mai ‏mitti ‎ki ‎murat ‎hargiz ‎nhi_Poet_Shabnam ‎Firdaus

میں 
مشک و زعفران سے بنی نہیں 
مٹی سے جنمی  ہوں
لیکن  
مٹی کی مورت ہر گز نہیں
میں صبر و ضبط کی ملکہ ہوں   
 میرے بھی سینے میں ہے دل 
عقل و شعور ہے مجھ میں بھی 
ہر بات میں حق جتاتے ہو 
ہے تمکو شاید علم نہیں 
حق میرا تم پر ہے زیادہ 
جذباتِ پر انکش رکھنے کا 
رشتوں کو لے کر چلنے  کا 
دھاگہ میں پرو کر رکھنے کا 
کوئی موتی ٹوٹ کے بکھرے نہ 
کوئی روٹھ کے مجھ  سے بچھڑے  نہ 
ہر زخم کو خود سے سینے کا 
ہر دکھ کو ہنس کر جینے کا 
ہنر یہ مجھکو آتا ہے
طاقتور خود کو سمجھنے ہو 
طاقت میں کم تو میں بھی نہیں 
ہر جنگ میں میں نے ساتھ دیا 
کبھی خود لڑی ، زخم صاف کیا 
کبھی  سیتا ہوں ، کبھی  درگا ہوں  
ہیلین اور  اٹلانٹا ہوں 
جون آف آرک بھی میں ہی ہوں
  روپ ہیں جتنے بھی  میرے
ہر روپ میں تم پر بھاری ہوں
ضد پر اپنی آؤں گر 
میں ٹوٹ کے بکھروں ، مانوں نہیں 
مٹی سے جنمی  ہوں 
لیکن 
مٹی کی مورت ہرگز نہیں
شبنم فردوس

मैं मिट्टी की मूरत हरगिज़ नहीं

मैं मुश्क_ओ_ज़ाफरान से बनी नही
मिट्टी से जन्मी हूं
 लेकिन
मिट्टी की मूरत हरगिज़ नहीं
मैं सब्र_ओ_ज़ब्त की मलका हूं
मेरे भी सीने में है दिल
अक़्ल_ओ_शुऊर है मुझ में भी
हर बात में हक़ जताते हो
है तुमको शायद इल्म नहीं
हक़ मेरा तुम पर है ज़्यादा
जज़्बात पर अंकुश रखने का 
रिश्तों को लेकर चलने का
धागा में पिरो कर रखने का
कोई मोती टूट के बिखरे ना
कोई रूठ के मुझसे बिछड़े ना
हर ज़ख्म को खुद से सीने का 
हर दुख को हंसकर जीने का 
हुनर ये मुझको आता है
ताकतवर खुद को समझते हो 
ताक़त में कम तो मैं भी नही
हर जंग में मैने साथ दिया 
कभी खुद लड़ी, ज़ख्म साफ़ किया
कभी सीता हूं, कभी दुर्गा हूं
हेलेन और अटलांटा हूं
जान ऑफ आर्क भी मैं ही हूं
रूप हैं जितने भी मेरे 
हर रूप में तुम पर भारी हूं
ज़िद पर अपनी आऊं गर
मैं टूट के बिखरूं मानूं नही
मिट्टी से जन्मी हूं 
लेकिन

मिट्टी की मूरत हरगिज़ नहीं
शबनम फिरदौस

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Monday, 26 July 2021

Nazm_Mujhe Khoj Hai Aesi Duniya Ki_Poet_Shabnam Firdaus

مجھے کھوج ہے ایسی دنیا کی 

دل اوب چکا اس دنیا سے
مجھے کھوج ہے ایسی دنیا کی
 جہاں دھرتی امبر ملتے ہوں 
 تارے زمیں پر اگتے ہوں
اور چاند پہ کوئی داغ نہ ہو
مجھے کھوج ہے ایسی دنیا کی
جہاں اونچ_نیچ کا بھید نہ ہو
ذات_پات کی قید نہ ہو
دھرم کی دیوار نہ ہو
پارٹی ، پالیٹکس، پاور کا
کوئی کرنے والا وار نہ ہو
جہاں بانٹ کے کھانے کی عادت ہو 
بھوک سے کوئی تڑپے نہ 
کوئی بچہ دودھ کو بلکے نہ
مجھے کھوج ہے ایسی دنیا کی
جہاں مانگ کسی کی اجڑے نہ
دنیا کسی کی بکھرے نہ
جہاں سارے چہرے ہنستے ہوں 
مل جل کے سارے رہتے ہوں
خوف کے سائے منڈلائیں نہ 
بس پیار کی گنگا بہتی ہو 
مجھے کھوج ہے ایسی دنیا کی
شبنم فردوس


"मुझे खोज है "ऐसी दुनिया की


दिल ऊब चुका इस दुनिया से
मुझे खोज है ऐसी दुनिया की 
 जहां धरती अंबर मिलते हों
तारे ज़मीं पर उगते हों
और चांद पे कोई दाग़ न हो
मुझे खोज है ऐसी दुनिया की
जहां ऊंच-नीच का भेद न हो
जहां जात पात की क़ैद न हो
 धर्म की दीवार न‌ हो
पार्टी ,पॉलिटिक्स, पावर का
 कोई करने वाला वार न हो
जहां बांट के खाने की आदत हो
 भूख से कोई तड़पे ना
 कोई ‌बच्चा दूध को बिलके ना
जहां मांग किसी की उजड़े ना
दुनिया किसी की बिखरे ना
जहां सारे चेहरे हंसते हों
मिल जुल के सारे रहते हों
 खौ़फ़ के साए मंडराएं ना
 बस प्यार की गंगा बहती हो
मुझे खोज है ऐसी दुनिया की
शबनम फिरदौस

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Friday, 16 July 2021

Nazm_Maan Ager Tum Na Hoti_Poet _Shabnam Firdaus

ماں اگر تم نہ ہوتی 

ماں 
اگر تم نہ ہوتی 
جیون سارتھک نہ ہوتا 
جیون کی 
اس گاتھا میں
ایک قدم آگے نہ بڑھتی 
دکھ نے جب جب 
گھیرا مجھکو
سینے سے لپٹا کر تم 
مجھکو ہمت دیتی تھی 
چپکے ، چپکے روتی تھی 

تم نے ہی تو 
سیکھایا تھا 
دکھ کو پشت پہ لادے کیسے 
آگے بڑھتے رہنا ہے 
ٹیڑھے ،میڑھے رستے پر 
بے خوف و خطر 
 کیسے چلنا ہے  
تم ہی تو یہ کہتی تھی 
جیون کے اس رستے میں 
ایسی بھی کچھ 
جا ملے گی 
دور تلک پانی نہ ہوگا 
پیاس سے لب یہ سوکھیں گے
لیکن تم گھبرانا مت 
ایڑی کے
گھس گھس جانے سے 
ہمت ہار نہ جانا تم 
ایڑی کے گھسنے سے یی 
منزل تم پاؤ گی، گڑیا
ماں اگر تم 
نہ ہوتی تو 
جیون کی نیا کو
 کھیتے 
بیچ بھنور میں 
ذوب ہی جاتی 
تم نے ہی تو سکھلایا تھا 
ناؤ کو کھینے ،
مجدھاروں سے 
بچ کے نکلنے کا فن مجھ کو
ماں اگر تم نہ ہوتی تو 
جیون کے اس 
رنگ منچ پہ  
ہرگز ٹک نہ پاتی میں 
تم سے ہی تو 
گیان ملا ہے 
بھومیکا خوب نبھانے کا
اب تم ہی بتاؤ مجھکو
بن تمہارے کیسے میرا
جیون سارتھک ہوتا، ماں
شبنم فردوس

मां अगर तुम ना होती

मां

अगर तुम न होती

जीवन सार्थक न होता

जीवन की

इस गाथा में

एक क़दम आगे न बढ़ती

दुख ने जब जब

घेरा मुझको

सीने से लिपटा कर तुम

मुझ को हिम्मत देती थी,

चुपके ,चुपके रोती थी

तुमने ही तो

सिखाया था दुख को *पुष्त* पे लादे कैसे

आगे बढ़ते रहना है

टेढ़े मेढ़े रस्ते पर

बेखो़फ़ -ओ-ख़तर

कैसे चलना है

तुम ही तो यह कहती थी

जीवन के इस रस्ते में

ऐसी भी कुछ

जा मिलेगी

दूर तलक पानी न होगा

प्यास से लब यह सूखे गे

लेकिन तुम घबराना मत

एड़ी के

घिस-घिस जाने से

हिम्मत हार न जाना तुम

ऐड़ी के घिसने से ही

मंजिल तुम पाओगी, गुड़िया

मां अगर तुम

न होती तो

जीवन की नैया को खेते

बीच भंवर में

डूब ही जाती

तुमने ही तो सिखलाया था

नाव को खेने,

मझधारों से

बच के निकलने का फ़न मुझको

मां अगर तुम न होती तो

जीवन के

इस रंगमंच पे

हरगिज टिक न पाती मैं

तुमसे ही तो ज्ञान मिला है

भूमिका खूब निभाने का

अब तुम ही बताओ

बिन तुम्हारे कैसे मेरा

जीवन सार्थक होता, मां

शबनम फ़िरदौस
ss

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Sunday, 11 July 2021

Nazm_Mei Durga Hun_Poet_ Shabnam Firdaus

میں درگا ہوں
سنو اس یگ کے راون تم 
نہ سمجھو مجھکو سیتا تم 
کہ دھرتی میں سما جاؤں
نہ گندھاری 
کہ باندھے پٹی آنکھوں پر
یہ دنیا میں تمہاری نظروں سے دیکھوں
میں  درگا ہوں 
میں  کالی ہوں 
مجھے  اپنی  حفاظت خود کرنی ہے 
سنو اس یگ کے راون تم
عقابی نظریں رکھتی ہوں
مری جانب جو دیکھو گے
میں آنکھیں پھوڑ ڈالوں گی 
 میں تمکو چیر ڈالوں گی
فردوس
मैं दुर्गा हूं

सुनो इस युग के रावण तुम
ना समझो मुझको सीता तुम
कि धरती में समा जाऊं
ना गंधारी
कि बांधे पट्टी आंखों पर
 यह दुनिया मैं तुम्हारी नज़रों से देखूं
मैं दुर्गा हूं 
मैं काली हूं
मुझे अपनी हिफा़ज़त खुद करनी है
सुनो इस  युग के रावण तुम
उका़बी नज़रें रखती हूं
मेरी जानिब जो देखोगे 
मैं आंखें फोड़ डालूंगी
मैं तुमको चीर डालूंगी
शबनम फिरदौस

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