Friday, 8 April 2022

Nazm (Kavita)___Makdi Jaal ,Poet__Shabnam Firdaus

مکڑی جال


جبیں پر شکن 

رخ پہ رنج و الم

ماتمی آنکھیں لے کے 

یوں بیٹھے ہو کیوں تم ؟ 

اٹھو ! 

مکڑی جالے کو توڑو 

اندھیرے کو چیرو 

مرے پاس آؤ

میں اب بھی وہیں ہوں 

جہاں تم نے چھوڑا

ہمیشہ سے ہوں  منتظر میں تو باہیں پسارے 

مری آنکھیں کب  سے تمہاری ہی دہلیز پر  تھیں  

مرے کان کب سے تمہاری ہی دیوار سے تھے  لگے 

کب  مجھے تم صدا دو

مری اور دیکھو 


کبھی خود کو دیکھا بھی ہے  آئینے میں

کہ تم  کیا سے کیا ہوگئے  ان دنوں میں 

مگر خود کو کیسے بھلا دیکھتے تم

فصیلیں جو اونچی اٹھائی تھیں  تم نے

کہیں کوئی روزن دیا ہی نہیں 

اندھیرا

اندھیرا

بلا کا اندھیرا

ہے مکڑی کا ڈیرا

پھنسے کوئی اس میں 

نکل ہی نہ پائے 

مگر اس اندھیرے سے تم کو ضیا کھینچنی ہے 

اٹھو!

مکڑی جالے کو توڑو

اندھیرے کو چیرو 

میرے پاس آؤ



شبنم فردوس

मकड़ी जाल

*जबीं* पर *शिकन*
*रुख़* पे *रंजो अलम* 
मातमी आंखें ले के
यूं बैठे हो क्यों तुम ?
उठो ।
मकड़ी जाले को तोड़ो 
अंधेरे को चीरो
मेरे पास आओ
मैं अब भी वहीं हूं 
जहां तुमने छोड़ा
हमेशा से हूं मुंतज़िर मैं तो बाहें पसारे
मेरी आंखें कब से तुम्हारी ही दहलीज़ पर थीं
मेरे कान कब से तुम्हारी ही दीवार से थे लगे
कब मुझे तुम *सदा* दो
 मेरी ओर देखो
कभी ख़ुद को देखा भी है आईने में
कि तुम क्या से क्या हो गए इन दिनों में
मगर ख़ुद को कैसे भला देखते तुम
*फ़सीलें* जो ऊंची उठाई थीं तुमने
कहीं कोई *रोज़न* दिया ही नहीं
अंधेरा 
अंधेरा 
बला का अंधेरा
है मकड़ी का डेरा
फंसे कोई इसमें 
निकल ही ना पाए
मगर इस अंधेरे से तुमको *ज़िया* खींचनी है
उठो ।
मकड़ी जाले को तोड़ो
अंधेरे को चीरो
मेरे पास आओ 
शबनम फ़िरदौस


जबीं --- forehead
शिकन --- wrinkle, crease
रुख़ --- face
रंजो अलम ___ grief and sorrow
फ़सीलें __wall of enclosure around fort 
सदा---call,
रोज़न---window
ज़िया---light

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1 Comments:

At 27 September 2022 at 14:14 , Anonymous Anonymous said...

Wahhhhh

 

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