Wednesday, 30 June 2021

Nazm _Neem Sang Khwab_Poet Shabnam Firdaus

نیم سنگ خواب

ہ ۔۔۔
ے ۔۔
۔۔ہ۔۔۔ے ۔۔ےےے
ہے۔۔ہے 
ر
ر
ر۔۔ک۔۔۔ک
ر۔۔۔ر۔۔۔ک ۔۔و۔۔
رک۔۔و۔۔وو۔۔۔۔رکووو
او بھائی تم 
خواب کی بیلیں 
نوچ رہے کیوں ؟
کتنی مشکل سے تو میں نے 
کشت کیا تھا 
کتنی محنت کر کے 
انکو 
نیم شجر پر لٹکا یا تھا
ہوش کے ناخن
 لو تم چھٹکی 
نیم بہت ہے 
کڑوا، کڑوا
ان کڑوی ،کڑوی شاخوں پر
خواب کی بیلیں 
رکھو گی تو 
خواب بھی
 کڑوے ہوجائیں گے 
 بعد میں پھر پچھتاؤ گی تم 
چھوڑو ،چھوڑو
مت نوچو تم 
نیم کے سنگ رہنے دو انکو  
خواب ہیں میرے 
میٹھے، میٹھے،
رنگ رنگیلے
رس رسیلے 
نیم میں ہوں تحلیل اگر یہ
نیم بھی میٹھا ہوجائے گا
یا دونوں کے ملنے سے پھر 
ذائقہ نیا بن جائے گا
شبنم فردوس

हे 
हे 
हे ह
 रु ..र ..
र ...को ..
रुको ..रुको..
ओ भाई तुम 
ख्वाब की बेलें 
नोच रहे क्यों
कितनी मुश्किल से तो मैंने
 किश्त किया था
कितनी मेहनत करके इनको
 नींम  शजर पर लटकाया था
होश के नाखू़न
 लो तुम छुटकी

नीम बहुत है 
कड़वा कड़वा
इन कड़वी कड़वी शाख़ों पर 
ख़्वाब की बेले रखोगी तो
ख्वाब भी
 कड़वे हो जाएंगे 
बाद में फिर पछताओगी तुम
छोड़ो छोड़ो 
मत नोचो तुम 
नीम के संग आने दो इनको

ख्वाब है मेरे 
मीठे-मीठे
 रंग रंगीले
 रस रसीले
ख्वाब में हों तहलील अगर यह 
ख़्वाब भी मीठे हो जाएंगे
या दोनों के मिलने से फिर 
जायका नया बन जाएगा
शबनम फिरदौस

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Thursday, 24 June 2021

Nazm _Badalon ki Oat se ,Poet Shabnam Firdaus

Poet _Shabna Firdaus

بادلوں کی اوٹ سے

بادلوں کی
 اوٹ سے 
جھانک سورج 
کہہ رہا تھا
بادلوں سے بولو جاں 
اب اس جگہہ سے جائیں بھی
کب سے میری 
راہ میں 
خیمہ لگائے 
بیٹھے ہیں
یوں  ہوا کی دف پہ  یوں 
 کب تک کریں گے 
تاتا، تھیا  
میں قرنطینہ میں رہ کر
تھک چکا ہوں 
اب نکلنا ہے مجھے 
سانس کھل کے لینا ہے 
روشن جہاں بھی کرنا ہے 
بادلوں سے بولو جاں 
خیمہ اکھاڑیں 
دف اتھائیں
چل پڑیں
شبنم فردوس

बादलों की ओट से

बादलों की 
ओट से 
झांक सूरज 
कह रहा था
बादलों से बोलो जां
 इस जगह से जाए भी
कब से मेरी 
राह में 
ख़ेमा लगाए 
बैठे हैं
कब तक हवा की दफ़ पे यूं
 करते रहेंगे ता ता थैया
मैं क़रंतीना* मे रह कर 
थक चुका हूं
अब निकलना है मुझे 
सांस खुल कर लेना है
रोशन जहां भी करना है
बादलों से बोलो जां
खै़मा उखाड़े
दफ़ उठाएं
चल पड़ें
शबनम फ़िरदौस


क़रंतीना _ Quarantine

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Saturday, 19 June 2021

Nazm _ mei tapti reit ki baasi hun

Poet _ Shabnam Firdaus
Nazm_ Mei tapti reit ki baasi hun
یہ بارش
 بالکل تم سی ہے 
کبھی جم کے
 خوب برستی ہے
کبھی رم جھم 
رم جھم ہوتی ہے
میں 
 تپتی ریت کی
 باسی ہوں 
اس رم جھم بارش سے 
کیسے میں
اپنی پیاس بجھاؤں گی
مجھے عشق ہے
 گہرے ساون سے
 شبنم فردوس

तपती रेत की बासी हूं



यह बारिश
 बिल्कुल तुमसे ही है
कभी जमके
 खूब बरसती है 
कभी रिमझिम
 रिमझिम होती है
मैं 
तपती रेत की 
बासी हूं

इस रिमझिम बारिश से 
कैसे मैं
अपनी प्यास बुझाऊंगी
मुझे इश्क़ है 
गहरे सावन से
शबनम फिरदौस

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Saturday, 12 June 2021

Safura Zergar

صفورہ زرگر

گھنا اندھیرا 
تھا چاروں جانب 
دکھائی دیتا نہ رستہ کوئی 
 طلوعِ سورج کے منتظر سب
اسی جگہ پر ٹھہر گئے تھے 
مگر وہ تنہا 
نکل پڑی تھی   
اسے پتہ تھا 
کہ  اپنے حصے کی روشنی کو
تلاش کرنا پڑیگا  خود ہی  
یہاں اجالا کبھی نہ ہوگا 
گھنے درختوں کے درمیاں  کیا 
کرن کبھی بھی پہنچ سکی ہے
کبھی نہ منزل ملے گی ہم کو 
تلاش _ منزل کی جستجو میں 
کسی کو ہمت تو کرنی ہوگی 

قدم وہ اپنا بڑھا رہی تھی 
عجب لگن تھی  غضب کی دھن تھی 
یقیں کو آنچل میں اپنے باندھے 
ہزار مشکل سے لڑ پڑی تھی
فلک نظر میں سما چکا  تھا
سراغ _ منزل وہ  پا چکی تھی 
تبھی اچانک
کسی نے اس کو  دبوچا , کھینچا   
عجب ہی رستے پر لے چلا تھا  
وہ بے خبر تھی 
اندھیرا آنکھوں کو ڈس رہا  تھا
 ہجومی وحشت کی آہٹوں کو وہ سن رہی تھی
ہزار تہمت کے تیر جاں میں گڑے ہوۓ ہیں 
وہ اب قفس میں ہے قید لیکن
لبوں پہ مسکان یے یقیں کا
 جلاٸ تھی  جو مشال اس نے
بجھی نہیں ہے 
نہیں بجھے گی ۔۔۔!
شبنم فردوس
08/06/20
सफूरा जरगर

घना अंधेरा था 
चारों जानिब
दिखाई देता ना रस्ता कोइ
तलूए  सूरज के मुंतज़िर सब
उसी जगह पर ठहर गए थे
मगर वह तन्हा
 निकल पड़ी थी
उसे पता था 
के अपने हिस्से की रोशनी को
तलाश करना पड़ेगा खुद ही
यहां उजाला कभी ना होगा
घने दरख़्तों के दरमियां क्या
किरण कभी भी पहुंच सकी है
कभी न मंजिल मिलेगी हमको
तलाशें मंजिल की जुस्तजू में 
किसी को हिम्मत तो करनी होगी
कदम वह अपना बढ़ा रही थी
अजब लगन थी गज़ब की धुन थी
यकीं को आंचल में अपने बांधे
हज़ार मुश्किल से लड़ पड़ी थी
फलक नज़र में समा चुका था
सुरागे मंजिल वह पा चुकी थी
तभी अचानक
 किसी ने उसको दबोचा,
 खींचा
अजब ही रास्ते पर ले चला था
वह  बेखबर थी
 अंधेरा आंखों को डस रहा था
हुजूमी वहशत की आहटौ  को
वह सुन रही थी
हज़ार तोहमत के तीर जां में गड़े हुए है
वह अब क़फ़स में है क़ैद लेकिन
लबों पे मुस्कान है यकीं का
जलाई थी जो मशाल उसने
बुझी नहीं है 
नहीं बुझेगी

शबनम फिरदौस
08/06/ 20Published from Blogger Prime Android App

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