Monday, 30 August 2021

Nazm(कविता)_Bin Tere_Poet_Shabnam Firdaus

بن تیرے 
 
بن ترے میری جاں
میں ہوں کچھ بھی نہیں 
ہوں ادھوری سی میں 
تو جو آئے کبھی 
میں بتاؤں تجھے 
کیسے گزرے یہ دن
راتیں کیسے کٹیں
تو جو آئے کبھی 
میں سناؤں تجھے 
ہجر کی داستاں 
  دل کی دھڑکن مری 
کیسی گم سم سی ہے 
خواب آنکھوں میں اب
جھلملاتے نہیں 
لپٹی مایوسی ہے 
پلکوں سے ہر گھڑی 
رت بسنتی مجھے 
اب لبھاتی نہیں 
تو جو آئے کبھی 
میں دکھاؤں تجھے 
کیا سے کیا ہوگئی 
بن ترے میری جاں
میں فنا ہوگئی
شبنم فردوس

बिन तेरे

बिन तेरे मेरी जां
मैं हूं कुछ भी नहीं
हु अधूरी सी मैं
तू जो आए कभी
 मैं बताऊं तुझे
कैसे गुज़रे यह दिन
 रातें कैसे कटीं
तू जो आए कभी 
मैं सुनाऊं तुझे
हिज्र की दास्तां
दिल की धड़कन मेरी
कैसी गुमसुम सी है
ख़्वाब आंखों में अब
झिलमिलाते नहीं
लिपटी मायूसी है
 पलकों से हर घड़ी
रुत बसंती मुझे
अब लुभाती नहीं
तू जो आए कभी
मैं दिखाऊं तुझे
बिन तेरे मेरी जां
क्या से क्या हो गई
मैं फ़ना हो गई
शबनम फिरदौस

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Monday, 23 August 2021

Nazm(Kavita)_Bharam_Poet_Shabnam Firdaus

بھرم
چھپا کے زخم سینے میں
تھپک کے درد آنکھوں میں
بظاہرتو بہت مضبوط بنتی ہوں
کسی کے بھی سوالوں کو 
میں ہنس کے ٹال دیتی ہوں
حقیقت ہے مگر یہ بھی
قفس میں ذہن کے میرے
عجب اک خوف کنڈلی مار کے بیٹھا
مجھے ہر وقت ہے ڈستا
کہ چاندی پر رنگ سونا
چڑھا رکھا ہے جو میں نے
بھرم کھل جائے نہ میرا
ہوئیں گر بے وفا آنکھیں
بہے گا درد آنکھوں سے
سنبھل پاؤں گی پھر کیسے
اٹھانی ہوگی تب خفت 
سبھی کے سامنے مجھکو
 شبنم فردوس

भ्रम

छुपा के ज़ख्म सीने में
थपक के दर्द आंखों में
बजा़हिर तो बहुत मज़बूत बनती हूं
किसी के भी सवालों को 
मैं हंसकर टाल देती हूं
हक़ीक़त है मगर यह भी
क़फ़स में ज़हन के मेरे
 अजब एक खौ़फ़ कुंडली मार के 
 बैठा
मुझे हर वक्त है डस्ता 
कि चांदी पर रंग_ए_सोना
चढ़ा रखा है जो मैं ने 
भ्रम खुल जाए ना मेरा
हुईं गर बेवफ़ा आंखे
बहेगा दर्द आंखों से
संभल पाऊंगी फिर कैस
उठानी होगी तब खिफ़्फ़त
सभी के सामने मुझक
शबनम फ़िरदौस

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Monday, 16 August 2021

Nazm(kavita)_Kasak_Poet_Shabnam Firdaus

کسک
غمِ ہجر نے 
دی ہے دستک !
اٹھنے لگی ہے 
سینے میں کسک !
تیری یاد جگائے  گی 
پھر ساری رات مجھے !
شبنم فردوس

कसक
ग़म_ए हिज्र ने
दी है दस्तक
उठने लगी है सीने में कसक
तेरी याद जगाएगी
फिर सारी रात मुझे
शबनम फिरदौस

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Thursday, 12 August 2021

Nazm (कविता)_ Wapas loat Jao Tum_Poet_Shabnam Firdaus

واپس لوٹ جاؤ تم

بتاؤ کیوں بھلا تم لوٹ آئے ہو؟
 وہی لڑکی ہوں میں اب بھی 
 تمہیں جس سے شکایت تھی
 وہی منہ پھٹ سی لڑکی ہوں 
 نہیں برداشت کرتی تھی
 کسی کی بات جو بالکل,
کھری کھوٹی کسی کو بھی
 بنا سوچے سناتی تھی
 سنو ! گر ہے گماں تم کو 
 کہ میری سوچ کو حالات نے تبدیل کر ڈالا 
 غلط فہمی تمہاری ہے
 بتاؤ تو 
 کسی بنجر زمیں میں بھی ہوئی ہے فصل پیدا کیا ؟
زمیں اور آسماں کا بھی ملن تم نے کبھی دیکھا ؟
 نہیں دیکھا ؟
 تو میری بات مانو اور واپس لوٹ جاؤ تم 
مرے لہجے میں تلخی اور زیادہ ہی ملے گی اب
 تمہارے کھوکھلے وعدے جو پگھلے موم کی صورت 
مرے دل کے بدن پہ ہیں ہزاروں آبلے اس کے
 ہزاروں آبلوں میں تم ہزاروں درد پاؤ گے
 شبنم فردوس


वापस लौट जाओ तुम
बताओ क्यों भला तुम लौट आए हो?
वही लड़की हूं मैं अब भी
तुम्हे जिससे शिकायत थी
वह ही मुंहफट सी लड़की हूं
नही बर्दाश्त करती थी
किसी की बात जो बिल्कुल,
खरी खोटी किसी को भी 
बिना सोचे सुनाती थी
सुनो । गर है गुमां तुमको
कि मेरी सोच को हालात ने तब्दील कर डाला
ग़लत फ़हमी तुम्हारी है
बताओ तो
किसी बंजर ज़मी में भी
हुई है फ़सल पैदा क्या?
ज़मीन और आसमा का भी मिलन तुम ने कभी देखा?
नही देखा?
तो मेरी बात मानो और वापस लोट जाओ तुम
मेरे लहजे में तल्खी और ज़्यादा ही मिलेगी अब
तुम्हारे खोखले वादे जो
पिघले मोम की सूरत
मेरे दिल के बदन पे हैं हज़ारों आबले उसके
हज़ारों आबलों में तुम हज़ारों दर्द पाओ गे
शबनम फिरदौस

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Wednesday, 4 August 2021

Nazm(कविता)_waqt_Poet_Shabnam Firdaus


وقت
اک نجومی نے کہا تھا 
اب اکیلا پن ہی ہے تیرا مقدر
اُس گھڑی میں
ہنس پڑی تھی 
ساتھ میرے تم کھڑے تھے 
اب کہ ہجراں
آؤ دیکھو 
آج کیسے
وقت مجھ پر ہنس رہا ہے
 شبنم فردوس

वक़्त

एक नजूमी ने कहा था
अब अकेलापन ही है तेरा मुकद्दर
उस घड़ी मैं 
हंस पड़ी थी
साथ मेरे तुम खड़े थे
अब कि हिज्रां 
आओ देखो
आज कैसे 
वक़्त मुझ पर हंस रहा है
शबनम फिरदौस

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Tuesday, 3 August 2021

sher_Poet_Shabnam Firdaus


تو کیا ہجرت زدہ خوابوں کی ہے پھر واپسی ممکن؟ 
کہ میرے شہرِ دل میں اب بہاریں لوٹ آئی ہیں
 شبنم فردوس
तो क्या हिजरत ज़दह ख़्वाबों की है फिर वापसी मुमकिन
कि मेरे शहरे दिल में अब बहारें लौट आई हैं
शबनम फिरदौस

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