Nazm___Lahar_Poet_Shabnam Firdaus
لہر یہ کل ہی کی تو بات تھی اسی جگہہ اسی گھڑی پون کے مست جھونکے سی فضا میں عطر گھولتی وہ ہنستی کھلکھلاتی لڑکی آنکھ جسکی کانچ سی کہ جیسے ریڈیم ہو کوئی پانیوں پہ چلتے ہوئے لڑکھڑا کے گر پڑی مگر پلک جھپکتے ہی وہ اٹھ کے یوں کھڑی ہوئی کہ جیسے کہہ رہی ہو وہ نہیں ہے دم کسی میں بھی اسے کوئی گرا سکے کہ اس طرح ہرا سکے تو آج کیا ہوا اسے گری تو پھر اٹھی نہیں سنبھالا خود کو کیوں نہیں یوں لہر سنگ مچل پڑی ؟ فردوس लहर ये कल ही की तो बात थी इसी जगह इसी घड़ी पवन के मस्त झोंके सी फिज़ा में इत्र घोलती वह हंसती खिलखिलाती लड़की आंखें जिसकी कांच सी कि जैसे रेडियम हो कोई पानियों पे चलते हुए लड़खड़ा के गिर पड़ी मगर पलक झपकते ही वह उठ के यूं खड़ी हुई कि जैसे कह रही हो वह नहीं है दम किसी में भी उसे कोई गिरा सके कि इस तरह हरा सके तो आज क्या हुआ उसे गिरी तो फिर उठी नहीं संभाला खु़द को क्यों नहीं यू लहर स़ग क्यों चल पड़ी? शबनम फि़रदौस