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Ghazal _Poet _Javed Akhtar जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

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جدھر جاتے ہیں سب جانا ادھر اچھا نہیں لگتا مجھے پامال رستوں کا سفر اچھا نہیں لگتا غلط باتوں کو خاموشی سے سننا حامی بھر لینا بہت ہیں فائدے اس میں مگر اچھا نہیں لگتا مجھے دشمن سے بھی خودداری کی امید رہتی ہے کسی کا بھی ہو سر قدموں میں سر اچھا نہیں لگتا بلندی پر انہیں مٹی کی خوشبو تک نہیں آتی یہ وہ شاخیں ہیں جن کو اب شجر اچھا نہیں لگتا یہ کیوں باقی رہے آتش زنو یہ بھی جلا ڈالو کہ سب بے گھر ہوں اور میرا ہو گھر اچھا نہیں لگتا جاوید اختر  जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना बहुत हैं फ़ाएदे इस में मगर अच्छा नहीं लगता मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता जावेद अख्तर

Ghazal_Poet _Faiz Ahmad Faiz

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دونوں جہان تیری محبت میں ہار کے وہ جا رہا ہے کوئی شب غم گزار کے ویراں ہے مے کدہ خم و ساغر اداس ہیں تم کیا گئے کہ روٹھ گئے دن بہار کے اک فرصت گناہ ملی وہ بھی چار دن دیکھے ہیں ہم نے حوصلے پروردگار کے دنیا نے تیری یاد سے بیگانہ کر دیا تجھ سے بھی دل فریب ہیں غم روزگار کے بھولے سے مسکرا تو دیے تھے وہ آج فیضؔ مت پوچھ ولولے دل ناکردہ کار کے فیض احمد فیض  दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के वीराँ है मय-कदा ख़ुम-ओ-साग़र उदास हैं तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन देखे हैं हम ने हौसले पर्वरदिगार के दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के भूले से मुस्कुरा तो दिए थे वो आज 'फ़ैज़' मत पूछ वलवले दिल-ए-ना-कर्दा-कार के Faiz  Ahmad Faiz 

Ghazal(गजल)_Poet_Rahat Indori

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दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं इसी में ख़ुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं ये मय-कदा है वो मस्जिद है वो है बुत-ख़ाना कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं हमारे शहर के मंज़र न देख पाएँगे यहाँ के लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं Rahat Indori دلوں میں آگ لبوں پر گلاب رکھتے ہیں سب اپنے چہروں پہ دوہری نقاب رکھتے ہیں ہمیں چراغ سمجھ کر بجھا نہ پاؤ گے ہم اپنے گھر میں کئی آفتاب رکھتے ہیں بہت سے لوگ کہ جو حرف آشنا بھی نہیں اسی میں خوش ہیں کہ تیری کتاب رکھتے ہیں یہ مے کدہ ہے وہ مسجد ہے وہ ہے بت خانہ کہیں بھی جاؤ فرشتے حساب رکھتے ہیں ہمارے شہر کے منظر نہ دیکھ پائیں گے یہاں کے لوگ تو آنکھوں میں خواب رکھتے ہیں راحت اندوری

Ghazal (गजल)_poet _Javed Akhtar _अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी हैअभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है

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ابھی ضمیر میں تھوڑی سی جان باقی ہے ابھی ہمارا کوئی امتحان باقی ہے ہمارے گھر کو تو اجڑے ہوئے زمانہ ہوا مگر سنا ہے ابھی وہ مکان باقی ہے ہماری ان سے جو تھی گفتگو وہ ختم ہوئی مگر سکوت سا کچھ درمیان باقی ہے ہمارے ذہن کی بستی میں آگ ایسی لگی کہ جو تھا خاک ہوا اک دکان باقی ہے وہ زخم بھر گیا عرصہ ہوا مگر اب تک ذرا سا درد ذرا سا نشان باقی ہے ذرا سی بات جو پھیلی تو داستان بنی وہ بات ختم ہوئی داستان باقی ہے اب آیا تیر چلانے کا فن تو کیا آیا ہمارے ہاتھ میں خالی کمان باقی ہے جاوید اختر  अभी ज़मीर में थोड़ी सी जान बाक़ी है अभी हमारा कोई इम्तिहान बाक़ी है हमारे घर को तो उजड़े हुए ज़माना हुआ मगर सुना है अभी वो मकान बाक़ी है हमारी उन से जो थी गुफ़्तुगू वो ख़त्म हुई मगर सुकूत सा कुछ दरमियान बाक़ी है हमारे ज़ेहन की बस्ती में आग ऐसी लगी कि जो था ख़ाक हुआ इक दुकान बाक़ी है वो ज़ख़्म भर गया अर्सा हुआ मगर अब तक ज़रा सा दर्द ज़रा सा निशान बाक़ी है ज़रा सी बात जो फैली तो दास्तान बनी वो बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी ...