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Nazm (कविता)_Mai Sochta Hun_Poet_Iftekhar Bukhari

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मैं सोचता हूं अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल कदमी की तरह यख़ बसता पहाड़ों में सफे़द सुरंगो जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए  सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर असरारी में भटकने के लिए या दुनिया दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते   मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते  प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियां होतीं कंदीम चट्टान पर कंदा ना क़ाबिले फ़हम नक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए  भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते  मेरे जीते जी आखिरी हिचकी की लेने के लिए या मेरे बाद कुछ पल  मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते  सुबह काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए  उम्र गुज़ार कर  मैं सोचता हूं यह मुमकिन नहीं  इस दुनिया की बे इंतहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाय दो तन्हाइयों के  तू  और मैं इफ़्तिख़ार बुखा़री میں سوچتا ہوں  ۔ اگر دو راستے ہوتے تم تک جانے کے لیے  کسی باغ میں چہل قدمی کی طرح  یخ بستہ پہاڑوں میں  سفید سرنگوں جیسے اگر دو خواب ہو...

Nazm(कविता)_Surkh Ru_Poet_Shabnam Firdaus

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جویریہ عامر کے نام سرخ رو نہیں نہیں وہ سرخ رو گلاب جیسی  اس جہان کی نہیں الگ کسی جہاں کی ہے پری ہے یا فلک سے سیدھے  اس زمیں پہ اتری ہے لبوں پہ رقص زندگی  عجیب نور آنکھوں میں محبتوں کا اک چراغ  لے کے اپنے ہاتھوں میں یہ کس جگہہ وہ آگئی  اسے یہ کیا خبر نہیں  کہ شہر پتھروں کا ہے  یہاں پہ جو بھی آتا ہے  یہیں کا ہوکے رہتا ہے  شبنم فردوس सुर्ख़ रू नहीं नहीं वो सुर्ख़ रू गुलाब जैसी इस जहान की नहीं अलग की जहां की है परी है या फ़लक से सीधे इस ज़मीं पे उतरी है लबों पे रक़्स_ए_ज़िंदगी अजीब नूर आंखों में मोहब्बतों का इक चिराग़ लेके अपने हाथों में ये किस जगह वो आ गई उसे ये क्या ख़बर नही कि शहर पत्थरों का है यहां पे जो भी आता है  यहीं का हो के रहता है शबनम फि़रदौस

Nazm(कविता)_Pathar Ki Aankh_Poet_Shabnam Firdaus

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پتھر کی آنکھ سنو!!!  اے روشنی زادے  اٹھائے ہاتھ میں سورج  یہ کس بستی میں آئے ہو؟ یہ بستی اندھے لوگوں  کی  یہاں کیا کام سورج کا ؟ یہاں سے تم چلے جاؤ  ابھی فوراً چلے  جاؤ سنو!!!!   یہ  لوگ بستی کے پکاریں  گے ,  دہائی بھی تمہیں دیں گے خدا را تم  پلٹنا مت کہ  دیکھو گے جو تم  مڑ کر  تمہاری آنکھ پتھر کی ہو جائے گی شبنم فردوس पत्थर की आंख सुनो।।।  ए रौशनी ज़ादे उठाए हाथ में सूरज यह किस बस्ती में आए हो? यह बस्ती अंधे लोगों की यहां क्या काम सूरज का? यहां से तुम चले जाओ अभी फौरन चले जाओ सुनो।।। यह लोग बस्ती के  पुकारेंगें, दोहाई भी तुम्हें देंगें ख़ुदारा तुम पलटना मत कि देखोगे जब तुम मुड़कर तुम्हारी आंख पत्थर की हो जाएगी शबनम फ़िरदौस ss