Sunday, 24 April 2022

Nazm(kavita)__Khota Sikka, poet_Shabnam Firdaus

کھوٹا سکہ

جب سکہ اپنا
کھوٹا ہو 
تو دوش
 کسی کو کیا دینا

معصوم بنا وہ پھرتا تھا
ہر بات میں
 دھوکہ دیتا تھا
ہر بار کہانی 
گڑھتا تھا
 وہ سب کو جھوٹا کہتا تھا
چہرے پہ کتنے چہرے تھے
 مجھکو یہ معلوم نہ تھا

کیوں آج
 تمہیں ہے دکھ آخر
جو بویا تھا
وہ کاٹو گے
غلطی تو تمہاری اپنی تھی 
 الٹی عینک سے دیکھا تھا
شبنم فردوس


खोटा सिक्का

जब सिक्का अपना 
खोटा हो
तो दोष
 किसी को क्या देना
मासूम बना वह फिरता था
हर बात में
धोका देता था
हर बार कहानी
गढ़ता था
वह सब को झूठा कहता था
चेहरे पे कितने चेहरे थे
मुझ को यह मालूम न था

क्यों आज
तुम्हें है दुख आखि़र
जो बोया था
वह काटो गे
ग़लती तो तुम्हारी अपनी थी
उल्टी ऐनक से देखा था

शबनम फ़िरदौस

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Wednesday, 13 April 2022

Nazm(Kavita)__Aas Ka Diya ,Poet_Shabnam Firdaus

آس کا دیا

اگر فرصت ملے تم کو

گھماؤ وقت کا پہیہ ذرا پیچھے

نظر آئیں گی وہ آنکھیں 

جو چاندی سی چمکتی تھیں

جوگہری جھیل جیسی تھیں

وہ جن میں چاند بھی اکثر اترتا تھا

وہ آنکھیں ! ہاں وہی آنکھیں !

تمہارے خواب ساری رات بنتی تھیں

تمہیں پہنا کے  خوابوں کو 

روانہ پڑھنے کرتی تھیں 

تمہاری واپسی تک منتظر دہلیز پر رہتیں 

وہ آنکھیں اب تلک دہلیز ہی  پر  بیٹھی ہوئی  ہیں 

  اترتا ہی نہیں ہے چاند اب  ان میں 

کہ ہے سوکھی ہوئی وہ  جھیل مدت سے

سنو ! ان میں

مگر  اب بھی دیا اک آس کا توٹمٹماتا ہے

شبنم فردوس

आस का दिया

अगर फ़ुरसत मिले तुम को
घुमाओ वक्त़ का पहिया ज़रा पिछे
नज़र आएंगी वह आंखें
जो चांदी सी चमकती थीं
जो गहरी झील जैसी थीं
वह जिनमें चांद भी अकसर उतरता था
वह आंखें । हां वही आंखें।
तुम्हारे ख़्वाब सारी रात बुनती थीं
तुम्हें  पहना के ख़्वाबों को
रवाना पढ़ने करती थीं
तुम्हारी वापसी तक मुंतज़िर दहलीज़ पर रहतीं
वह आंखें अब तलक दहलीज़ ही पर बैठी हुई हैं
उतरता ही नहीं है चांद अब उनमें
कि है सुखी हुई वह झील मुद्दत से
सुनो। उन में
मगर अब भी दिया एक आस का तो टिमटिमाता है

शबनम फ़िरदौस

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Friday, 8 April 2022

Nazm (Kavita)___Makdi Jaal ,Poet__Shabnam Firdaus

مکڑی جال


جبیں پر شکن 

رخ پہ رنج و الم

ماتمی آنکھیں لے کے 

یوں بیٹھے ہو کیوں تم ؟ 

اٹھو ! 

مکڑی جالے کو توڑو 

اندھیرے کو چیرو 

مرے پاس آؤ

میں اب بھی وہیں ہوں 

جہاں تم نے چھوڑا

ہمیشہ سے ہوں  منتظر میں تو باہیں پسارے 

مری آنکھیں کب  سے تمہاری ہی دہلیز پر  تھیں  

مرے کان کب سے تمہاری ہی دیوار سے تھے  لگے 

کب  مجھے تم صدا دو

مری اور دیکھو 


کبھی خود کو دیکھا بھی ہے  آئینے میں

کہ تم  کیا سے کیا ہوگئے  ان دنوں میں 

مگر خود کو کیسے بھلا دیکھتے تم

فصیلیں جو اونچی اٹھائی تھیں  تم نے

کہیں کوئی روزن دیا ہی نہیں 

اندھیرا

اندھیرا

بلا کا اندھیرا

ہے مکڑی کا ڈیرا

پھنسے کوئی اس میں 

نکل ہی نہ پائے 

مگر اس اندھیرے سے تم کو ضیا کھینچنی ہے 

اٹھو!

مکڑی جالے کو توڑو

اندھیرے کو چیرو 

میرے پاس آؤ



شبنم فردوس

मकड़ी जाल

*जबीं* पर *शिकन*
*रुख़* पे *रंजो अलम* 
मातमी आंखें ले के
यूं बैठे हो क्यों तुम ?
उठो ।
मकड़ी जाले को तोड़ो 
अंधेरे को चीरो
मेरे पास आओ
मैं अब भी वहीं हूं 
जहां तुमने छोड़ा
हमेशा से हूं मुंतज़िर मैं तो बाहें पसारे
मेरी आंखें कब से तुम्हारी ही दहलीज़ पर थीं
मेरे कान कब से तुम्हारी ही दीवार से थे लगे
कब मुझे तुम *सदा* दो
 मेरी ओर देखो
कभी ख़ुद को देखा भी है आईने में
कि तुम क्या से क्या हो गए इन दिनों में
मगर ख़ुद को कैसे भला देखते तुम
*फ़सीलें* जो ऊंची उठाई थीं तुमने
कहीं कोई *रोज़न* दिया ही नहीं
अंधेरा 
अंधेरा 
बला का अंधेरा
है मकड़ी का डेरा
फंसे कोई इसमें 
निकल ही ना पाए
मगर इस अंधेरे से तुमको *ज़िया* खींचनी है
उठो ।
मकड़ी जाले को तोड़ो
अंधेरे को चीरो
मेरे पास आओ 
शबनम फ़िरदौस


जबीं --- forehead
शिकन --- wrinkle, crease
रुख़ --- face
रंजो अलम ___ grief and sorrow
फ़सीलें __wall of enclosure around fort 
सदा---call,
रोज़न---window
ज़िया---light

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Wednesday, 6 April 2022

Sheir _ Poet_ Ali Javed

طمانچہ وقت نے ایسا لگا دیا  ہے مجھے 
نہ جانے کب میں دوبارہ سے اٹھ  سکوں گا کبھی 
علی جاوید

तमाचा वक्त़ ने ऐसा लगा दिया है मुझे
न जाने कब मैं दुबारा से उठ सकूंगा कभी
अली जावेद

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