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Ghazal _Aankh Me Qaid Hai , Poet_Shabnam Firdaus

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آنکھ میں قید ہے روشنی کی طرح  جس کو دیکھا سدا خواب ہی کی طرح  اس کو دیکھوں تو قوس قزح کھل اٹھے  گفتگو جس کی ہے شاعری کی طرح  میرے مالک مجھے وہ ہنر بخش دے  زندگی ہو مری بندگی کی طرح  وہ فرشتہ صفت ،رب کی ہے اک عطا  جس نے چاہا مجھے عاشقی کی طرح  آنکھ میں ہے حیا، میں کہ فردوس ہوں  موت بھی آئے گی زندگی کی طرح  شبنم فرددس आंख में क़ैद है रोशनी की तरह जिस को देखा सदा ख़्वाब ही की तरह उसको देखूं तो क़ौस-ए-क़ज़ा खिल‌ उठे गुफ़्तगू जिसकी है शायरी की तरह मेरे मालिक मुझे वह हुनर बख़्श दे ज़िंदगी हो मेरी बंदगी की तरह वह फ़रिशता सिफ़त ,रब की है एक अता जिस ने चाहा मुझे आशक़ी की तरह आंख में है हया , मैं कि फ़िरदौस हूं मौत भी आएगी ज़िंदगी की तरह शबनम फ़िरदौस

Sher__Poet__Shabnam Firdaus

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نہ جانے اس نے کیا کہا تھا کان میں  کہ اب تلک ہے خوشبو میرے چار سو شبنم فردوس न जाने उस ने ‌क्या कहा था कान में कि अब तलक है खु़श्बू मेरे चार सु शबनम फ़िरदौस

Nazm___Lahar_Poet_Shabnam Firdaus

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لہر یہ کل ہی کی تو بات تھی  اسی جگہہ اسی گھڑی پون کے مست جھونکے سی  فضا میں عطر گھولتی  وہ ہنستی کھلکھلاتی لڑکی آنکھ جسکی کانچ سی  کہ جیسے ریڈیم ہو کوئی  پانیوں پہ چلتے ہوئے لڑکھڑا کے گر پڑی مگر پلک جھپکتے ہی وہ اٹھ کے یوں کھڑی ہوئی  کہ جیسے کہہ رہی ہو وہ  نہیں ہے دم کسی میں بھی اسے کوئی گرا سکے  کہ اس طرح ہرا سکے  تو آج کیا ہوا اسے  گری تو پھر  اٹھی نہیں سنبھالا خود کو کیوں نہیں  یوں لہر سنگ مچل پڑی ؟ فردوس लहर ये‌ कल ही की तो‌ बात थी इसी जगह इसी घड़ी पवन के मस्त झोंके सी फिज़ा में इत्र घोलती वह हंसती खिलखिलाती लड़की आंखें जिसकी कांच सी कि जैसे रेडियम हो कोई पानियों पे चलते हुए लड़खड़ा के गिर पड़ी मगर पलक झपकते ही वह उठ के यूं खड़ी हुई कि जैसे कह‌ रही हो वह नहीं है दम किसी में भी उसे कोई गिरा सके कि इस तरह हरा सके तो आज क्या हुआ उसे गिरी तो फिर  उठी नहीं संभाला खु़द को क्यों नहीं यू लहर स़ग क्यों चल पड़ी? शबनम‌ फि़रदौस

Sher_Poet_Shabnam Firdaus

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در آئی  ہے یہ خامشی جو بیچ ہمارے  اب یار بچھڑنے کے ہیں امکان ہزاروں   شبنم فردوس दर‌ आई‌ है ये ख़ाम्शी जो बीच हमारे अब यार बिछड़ने के हैं इमकान हज़ारों शबनम फ़िरदौस

Nazm_Hasil_E_Zindagi_Poet_Shabnam Firdaus

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حاصلِ زندگی وہ جب ناراض ہوتا ہے  میں اکثر اس سے کہتی ہوں  ہزاروں عیب ہیں مجھ میں  تو رشتہ توڑ لو نہ تم  مجھے پھر چھوڑ دو ناں تم  وہ کچھ لمحے تو بالکل چپ ہو جاتا ہے  امڈتے اشکوں کو اپنے  چھپا کر پلکوں کے پیچھے دبا کر درد سینے میں  بڑے ہی پیار سے بے ربط لہجے میں مرے ہاتھوں کو اپنے ہاتھ میں لے کر تھپکتا ہے  وہ کہتا ہے  دوبارہ ہجر کی باتیں نہ کرنا تم  مرا دل ایسی باتوں سے دھڑکنا بھول جاتا ہے  مری سانسیں اٹکتی ہیں زمیں رکتی ہوئی معلوم ہوتی ہے  مری جاں سوچ کر دیکھو  کبھی ایسا جو ہو جائے  زمیں چلنے سے رک جائے  تباہ ہو جائے گی دنیا  نہ دن سے رات ہو گی اور نہ کوئی رُت ہی بدلے گی  جدھر نظریں اٹھیں گی پھر  بیاباں دشت ہی ہو گا  مری جاں یاد رکھنا تم  میں زندہ ہوں فقط جو ساتھ ہے تیرا  رہیں سانسیں مری چلتی  ضروری پیار ہے تیرا  میں یہ بھی جانتا ہوں جاں ذرا ہوں تیز غصے کا  مگر تم ہو جنوں میرا  یہ ہے معلوم تم کو بھی  ہو حاصل زندگی کا تم  چلو مانا کہ تم کو...

Nazm(Kavita)_Nashili Dhun_Poet_Shabnam Firdaus

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نشیلی دھن سنو ! واپس پلٹ آؤ ابھی کچھ بھی نہیں بگڑا  ابھی حالات ہیں بس میں  سنو! مانا  کہ یہ رستے ہو جن پر گام زن اب تم  سحر انگیز ایسے ہیں کہ مشکل ہے پلٹ آنا   مگر تم نے  وہ پائڈ پائپر کی داستاں بھی تو سنی ہوگی کہ اس نے کس طرح معصوم بچوں کو کیا تھا گم پہاڑوں میں ؟  سنو یہ راہیں پائڈ پائپر کی اس نشیلی دھن ہی کی صورت  کسی بنجر سی وادی میں بہت ہی گہری کھائی میں  تمہیں اک دن گرا دیں گی تو میری بات مانو اور واپس لوٹ آؤ تم کہیں ایسا نہ ہو اک دن تمھارے ہاتھ سے میں ریت کی صورت پھسل جاؤں شبنم فردوس नशीली धुन सुनो! वापस पलट आओ अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा अभी हालात हैं बस में सुनो। माना कि ये रस्ते हो जिन पर गामज़न अब तुम सहर अनगेज़ ऐसे हैं कि मुश्किल है पलट आना  मगर तुम ने वह पाइड पाइपर की दासतां भी तो सुनी होगी कि उसने किस तरह मासूम बच्चों को किया था गुम पहाड़ों में ? सुनो । ये राहें पाइड पाइपर की उस नशीली धुन ही की सूरत  किसी बंजर सी वादी में  बहुत ही गहरी खाई में तुम्हें इक दिन गिरा देंगी तो मेरी बात मानो और वापस लौट आओ तुम कहीं ऐसा ...

Sheir_Poet_Shabnam Firdaus

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عجب خموشی میں ڈوبا ہوا ہے شہر۔ دل جمود ٹوٹے گا طوفان کوئی ائے گا شبنم فردوس अजब ख़मोशी में डूबा हुआ है शहर_ए_दिल जुमूद टूटेगा तूफ़ान कोई आएगा शबनम फ़िरदौस

Nazm (कविता)_Mai Sochta Hun_Poet_Iftekhar Bukhari

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मैं सोचता हूं अगर दो रास्ते होते तुम तक जाने के लिए किसी बाग़ में चहल कदमी की तरह यख़ बसता पहाड़ों में सफे़द सुरंगो जैसे अगर दो ख़्वाब होते सहमी हुई ख़ामोश रातों में जागने के लिए  सोने के लिए अगर दो जंगल होते पुर असरारी में भटकने के लिए या दुनिया दारों से कटने के लिए अगर दो परिंदे होते   मोहब्बत के लिए अगर दो सराब होते  प्यासा जीने के लिए प्यासा मरने के लिए अगर दो कहानियां होतीं कंदीम चट्टान पर कंदा ना क़ाबिले फ़हम नक़ूश में मदफ़ून याद करने के लिए  भूल जाने के लिए अगर दो गीत होते  मेरे जीते जी आखिरी हिचकी की लेने के लिए या मेरे बाद कुछ पल  मुझे रोने के लिए अगर दो सितारे होते  सुबह काज़िब की दहलीज़ पर चमकने के लिए बुझने के लिए  उम्र गुज़ार कर  मैं सोचता हूं यह मुमकिन नहीं  इस दुनिया की बे इंतहाई में दो चीज़ें नहीं होतीं सिवाय दो तन्हाइयों के  तू  और मैं इफ़्तिख़ार बुखा़री میں سوچتا ہوں  ۔ اگر دو راستے ہوتے تم تک جانے کے لیے  کسی باغ میں چہل قدمی کی طرح  یخ بستہ پہاڑوں میں  سفید سرنگوں جیسے اگر دو خواب ہو...

Nazm(Kavita)_Bawli_Poet_Shabnam Firdaus

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سنو!!! باؤلی تم  حقیقت سے کب تک چراؤ گی نظریں اندھیرے میں کب تک یوں بیٹھی رہوگی بھلا کب تلک خواب کی لاشیں پلکوں پہ ڈھوتی رہوگی ؟ ندی آنکھ کی ہو چکی خشک بالکل    اذیت انہیں اور کیوں دے رہی ہو ؟    کبھی وقت ٹھہرا کسی کی بھی خاطر ؟ تو کس معجزے کی ہو اب منتظر تم ؟ اٹھو باؤلی   اپنے خوابوں کو نوچو زمیں کھود  دفنا دو انکو  اجالے سے آنکھوں کو  خیرہ کرو تم  نئے خواب...